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     Ratangarh Tehsil  
   रतनगढ़ तहसील

        (संक्षिप्त अवलोकन)
 

  रतनगढ़ संभाग भारत गणराज्य के राजस्थान प्रान्त के चूरु मन्डल का उपमन्डल है जिसमें रतनगढ़ व सुजानगढ़ तहसीले शामिल है| इसके उत्तर पूर्व में चूरु, उत्तर में सरदारशहर, दक्षिण में सुजानगढ (चूरु जिला) पश्चिम में श्री डूंगरगढ़ व दक्षिणपूर्व में फतेहपुर (लक्ष्मणगढ़) तहसील की सीमायें है| 
27.5 डिग्री उत्तर अक्षांस व 34.37 डिग्री पूर्व देशान्तर में राजस्थान के उत्तरपूर्व भाग में रतनगढ़ की स्थिति है| समुद्रतल से औसतन उँचाई 308 मीटर है| तहसील का कुल क्षेत्रफल 169976 हेक्टर है जिसमें कृषी वा चरागाह की भूमि प्रायः 150000 हेक्टर है| पठार के नाम पर बिरमसर की डूंगरी है| भूमि बालुकामय है| सन् 2007 को जनगणना सर्देक्षण के अनुसार तहसील की जनसंख्या एकमात्रनगर रतनगढ़ के 63463, मात्र कस्बे राजलदेसर की 22736, उपकस्बा पड़िहारा व 101 गाँवों की 157030 यानि कुल जनसंख्या 244330 थी|  तहसील के मूलनिवासी बहुत बड़ी तादाद में प्रवासी बन गये है जो उपरोक्त गणना में शामिल नही है|
संभाग का जलवायु शुष्क है| गर्मी (मई से अगस्त) में औषतन अधिकतम तापमान 42 डिग्री सेन्टीग्रेड से उपर रहता है जो बहुत दफा 49 डिग्री से 51 डिग्री तक पहुँच जाता है| इस समय काली पीली आँधिया आती रहती है| सर्दी (नवम्बर से आधी फरवरी) की औसतन न्यूनतम तापमान 4 डिग्री सेन्टीग्रेड रहता है जो कभी कदास शून्य या उसमें निचे चला जाता है| थार मरुस्थल का यह संभाग जलाभाव से संतप्त रहता है एवम् बर्षात का वार्षिक औसत 320 मिलीमिटर आंका गया है जो सम्पूर्ण भारत में सबसे कम है| पेयजल का मुख्य स्त्रोत कुंडो में एकत्रित वर्षा का जल या कुँओं से निकाला गया भूगर्भ जल है जो प्रायः 150 फुट से 170 फुट की गहराई में मिलता है| भूगर्भ जल में क्षारीय रसायन की मात्रा 30% आँकी गई है| तहसील की संस्कृति अति प्राचीन है| बीकनेर संग्रहालय में रखा हुआ रतनगढ़ क्षेत्र में प्राप्त 11 वीं सदी का प्रस्तर फलक (नृत्यलीला) एवम् संवत 1309 अंकित सती देवली जो गाँव हुडेरा में है इसके जीवन्त प्रमाण है| रतनगढ़ नगर की स्थापना संवत 1955 से 1970 (सन 1719 से 1913) को मध्य बीकनेर रियासत के तत्कालीन महाराज सुरतसिंहजी ने अपने पुत्र रतनसिंहजी के नाम पर की थी| इसके पहिले यहाँ कोलासर व राजीया की ढाणीयाँ थी| मठ्ठाधीश शिवालय (16 वीं शताब्दी - कोलासर) साधुओं की बगीची, माता करणी मन्दिर के पिछाड़ी की सराफों की हवेली की आज भी कोलासर व राजीयों की ढा़णी की सौगात के रुप में दो शताब्दियों के बाद भी मौजूद है| क्षेत्र की भाषा डिंगलयुक्त राजस्थानी है|
      प्रकृति ने रेगिस्थान के ईस क्षेत्र को प्राकृतिक सम्पदाओं से बंचित रखा है| कृषी, कृषिजनित धंधे, पशुपालन (सन् 2003 के सर्वेक्षण के अनुसार पशुओं की संख्या 231175 आँकी गई थी) व रोजमर्रा की वस्तुओं का व्यापार ही यहाँ जीविका के मुख्य साधन है| भारत में सबसे कम बर्षात का क्षेत्र व बालुकामय मिट्टी की वजह से खेती की पैदावार औषत से कम है अतः प्रायः आकाल की विभीषीका का सामना करना पड़ता है| पैदावार में बाजरा, गुवांर, मोठ, मुंग तिल आदि प्रमुख है| पिछले कुछ वर्षो से ड्राई धार फारमींग व नलकुप की सिंचाई के जरिये गेहुँ, चना, मुफंली, जीरा, ईसबगोल, तिलहन आदि की फसल भी होने लगी है| चुंकि पैदावार कम व खपत ज्यादा है अतः आयातित सामग्री पर ही निर्भर करना पड़ता है| चुना भाटा व जिप्सम की लघुमात्रा को छोड़कर खनिज सम्पति नहीं के बराबर है| मरुभूमि का क्षेत्र होने के नाते पैट्रोल व प्राकृतिक गैस की संभावना को नकारा नहीं जा सकता| छोटी उत्पादन क्षमता के प्रायः 10 सिमेन्ट कारखाने है लेकिन वे भी पूर्णक्षमता से उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं| भेड़ की ऊन अच्छी किस्म व लम्बे रेशे की है जिसे बुनाई व रंगाई के लिये प्रायः बाहर भेज दिया जाता है| कुछ गृह उद्योग तथा लकड़ी की करीगरी, भुजिया, पापड़, प्लास्टीक बैग आदि विकास की ओर अग्रसर है|
    नगर में नागरिक सुविधायें समुन्नत, विकसित व सुलभ है| बिजली उचित मात्रा में उपलब्ध है| शिक्षण साधन अच्छा व विकसित है| क्षेत्र में दो कालेज (सेठ मोहनलाल जालान महाविद्यालय - लड़को के लिये व श्री मती केशरदेवी लोहिया महाविद्यालय - लड़कियों के लिये)| प्रायः दस उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मोन्टेसरी पद्धति के प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालय, आयुर्वेद कालेज, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, संस्कृत विद्यालय आदि है| चिकित्सा सुविधा सभी जगह सुलभ है एवम् जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी का कार्यलय भी रतनगढ़ में है| रतनगढ़ नागरिक परिषद द्वारा संचालित रोगी वाहन (Ambulance) सेवा सब समय तत्पर है| उत्तर रेलवे के बीकानेर संभाग का मीटर गेज रेल का मुख्य जंकशन रतनगढ़ है| बसों का प्रायः जाल सा बिछा हुआ है जो सम्पूर्ण राजस्थान, हरियाणा, आगरा, हरिद्वार दिल्ली आदि को जोड़ता है| पक्की सड़के, हरे-भरे उद्यान (बाग), ऊँचे शिखर वाले विशाल मन्दिर, कलात्मक भिति चित्रों की भव्य हवेलिया आदि दर्शनीय है एवम् उनकी बजह से यह एक पर्यटक स्थल बन गया है| 
  स्वर्णिम धोरों की धूल इस का सर्वांगीण विकास को, इन्ही कामनाओं के साथ मेरे इस संभाग को कोटिशः नमन|
संकलन
काशी प्रसाद झँवर
ओमप्रकाश सारस्वत             

   
        
 

                                                                                                                                                                      

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